नमस्कार 🙏 हमारे न्यूज पोर्टल - मे आपका स्वागत हैं ,यहाँ आपको हमेशा ताजा खबरों से रूबरू कराया जाएगा , खबर ओर विज्ञापन के लिए संपर्क करे +91 8756625830 ,हमारे यूट्यूब चैनल को सबस्क्राइब करें, साथ मे हमारे फेसबुक को लाइक जरूर करें , *गौना गांव का.. बियाह के छह महीने बाद से ही ससुराल वाले नाउ काका को दो बार गौना मांगने के लिए भेज चुके थे।* – News Anti Corporation Bharat

News Anti Corporation Bharat

Latest Online Breaking News

*गौना गांव का.. बियाह के छह महीने बाद से ही ससुराल वाले नाउ काका को दो बार गौना मांगने के लिए भेज चुके थे।*

😊 कृपया इस न्यूज को शेयर करें😊

*गौना गांव का..
बियाह के छह महीने बाद से ही ससुराल वाले नाउ काका को दो बार गौना मांगने के लिए भेज चुके थे।*

 

बाबू जी बार बार टाल रहे थे तब ससुर जी मामा ससुर जी को लेकर खुद ही आ गए और गौना का दिन धरने की जिद पर अड़ गए।
बाबू जी ने हार कर अगहन माह में गौना देने का दिन धर लिया।
जबसे दिन धराया था तबसे ही घर में तैयारी होनी शुरू हो गई थी। मां इधर उधर से मिली अच्छी साड़ी बक्से में और थोड़ा कम अच्छी साड़ी बड़के बक्से में रखती जा रही थी।
तमाम वाडिया सिकौहुली, बेना बना लिया था। जब भी बिसाती दुआर पर आता कुछ न कुछ खरीद कर रखती जा रही थी।
कोई भी रोजगारी आ जाता उससे कुछ न कुछ जरूर खरीद कर बक्से में रख देती।
बाबू जी गन्ने के पैसे का इंतजार कर रहे थे ताकि बड़ी बड़ी खरीदारी शुरू करें।
बाबू जी ने बगिया में सबसे पुरनके शीशम को बेचकर उससे मशहरी, कुर्सी, मेज इत्यादि बनवाने की तैयारी कर ली थी।

देखते ही देखते गौने का दिन नजदीक आने लगा। मां चावल, आटा, दाल, तेल इत्यादि साफ करने, चुनने के लिए बगल वाले गांव में अकेली रहने वाली आईया को हर दिन बुला लेती थीं।
सबको नाउ काका न्योता और बुलावा दे आए थे। दूर रहने वाली बुजुर्ग बुआ, बाबू जी की मामी,मौसी दस दिन पहले ही आ गई थीं। मां उन सबसे सब कुछ पूछकर तैयारी करने में जुटी थी।
जैसे जैसे गौने के दिन नजदीक आ रहे थे बिटिया रानी का भोजन छूटता जा रहा था। वो गुमशुम सी हो गई थी। सहेलियां आती और छेड़ती तो शर्मा कर मुस्करा देती थी। ससुराल का एक अनजाना सा डर मन में बसा था। न जाने वहां जाकर सब कुछ सही से संभाल सकेगी या नहीं।
बुआ, मौसी, भाभी हर दिन कुछ न कुछ सीख देती रहतीं थीं जिसे सुनकर वो मुंडी तो हिला देती थी लेकिन मन ही मन कुछ गलत न हो जाए के डर से घबरा जाती थी।
एक हफ्ता पहले से ही भाभी रोज शाम को बुकवा में कच्ची हल्दी पीस कर लगा देती थी।
एक दिन पक्की सहेली को बुलाकर कुछ रुपए देकर मां ने कहा कि बिट्टो को अपने साथ बाजार ले जाओ उसे जो भी खरीदना हो अपने मन पसंद का खरीद लेगी और जो तुम्हे समझ में आए जबरदस्ती दिलवा देना, मेरे कहने पर नहीं जाएगी तुम अपने नाम से बाजार ले जाओ।

एक दिन पहले से ही हलवाई मिठाई बनाने में लगे हुए थे। मामा जी, बुआ जी इत्यादि के घर से सभी लोग आ चुके थे और सबने अपनी अपनी जिम्मेदारी संभाल लिया था।
कोई मिठाइयों के गट्टे पैक कर रहा था तो कोई फर्नीचर का निरीक्षण कर रहा था।
भाभी लोग बिट्टू का बक्सा तैयार कर रही थीं। मां मौसी को भोजन की थाली देकर कहती हैं जाकर बिट्टू को थोड़ा खाना खिला दो कल रात से कुछ नहीं खाई है।
मौसी भोजन लेकर गई तो बिट्टू चादर में मुंह छिपाए रो रही थी। कल से ही रो रो कर आंखे सुजा रखी थी।
मौसी मनुहार करके भोजन करवाने की कोशिश करने लगी लेकिन उसे चुप करवाने के बजाय खुद ही रोने लगी। भाभी, बुआ, दीदी जो भी चुप करवाने आता वही रोने लगता।
तब भाइयों ने मोर्चा संभाला और अन्दर आकर खूब मजाक मस्ती करने लगे, चिढ़ाने लगे जिससे धीरे धीरे सब रोना बन्द करके मुस्कराने लगी और इसी का फायदा उठा कर भाइयों ने एक निवाला मेरी तरफ से कह कहकर सारा भोजन खिला दिया और मुस्कराते व आंखों की नमी सबसे छिपाते हुए बाहर चले गए।
गौनाहरू आ गए थे। सबको चाय नाश्ता करवाने के बाद भोजन करवाना उसके बाद विदाई करवानी थी।
उधर सब भोजन करने उठे इधर ट्रॉली पर मिठाई, फर्नीचर लदवाया जाने लगा।
सखियों संग मिलकर भाभी बिट्टू को तैयार करने में लगी हुई थी। मां सारे जेवर निकाल कर लाती हैं और कहती हैं कि मेरी लाड़ो को सब अच्छी तरह से पहना दो, रानी बना दो। मां को आवाज सुनकर बिट्टू मां को आवाज लगाती हैं लेकिन मां उसकी आवाज अनसुनी करके मुंह में आंचल ठूस कर रुलाई रोकते हुए भंडार घर की तरफ चली जाती हैं।
बिट्टू को तैयार करके चौक पर लाते हैं जहां पर नाउन काकी उनके पैरों में महावर लगाती हैं और बिछिया पहनाया जाता है। बिट्टू की सिसकी धीरे धीरे तेज हो रही थी और सभी महिलाओं के आंखे भी भरी हुई थीं।
जब मां चावल, गुड़, दूब,हल्दी लेकर कोछा पूजने लगती हैं तब तक बिट्टू की सिसकी तेज आवाज में रोने में बदल जाती है।
मुश्किल से कोछा पूज कर मां सूप बुआ को पकड़ाती हैं और बिटिया को सीने से चिपका कर रोने लगती हैं।
सभी महिलाएं बड़ी मुश्किल से उन्हें अलग करती हैं। भाभी, दीदी, बुआ, मौसी को अंकवार देते समय उनकी रुलाई देखकर सभी महिलाएं अपने आंसू नहीं रोक पाती हैं।
भैया अपने आंसू पोंछ कर आकर सबसे छुड़ाकर बिट्टू को डोली की तरफ ले चलता है। भैया के गले से लगी बिट्टू रोए जा रही थी और भैया बार बार रुमाल से अपनी लाल हो चुकी आंखे पोछता जा रहा था।
गाड़ी में बिट्टू को बैठा कर, गाड़ी थपथपा कर आगे बढ़ाने के लिए बोला कि तब तक बुआ, दीदी सभी बिट्टू के साथ गाड़ी में बैठ लेती हैं। गाड़ी धीरे धीरे घर छोड़ती जा रही थी, गाड़ी के साथ साथ सभी महिलाएं गांव के गोयडे तक आती हैं और फिर गाड़ी वहां रुकती है।
दीदी बिट्टू को चुप कराने की कोशिश करती हैं, पानी के कुछ घूंट पिलाती हैं, मां गाड़ी के ऊपर से एक लोटा जल उवार कर धरकावन चढ़ाती हैं। सभी महिलाएं गाड़ी से उतर जाती हैं और फिर दूल्हे राजा गाड़ी में बैठते हैं। भाभी कहती हैं कि… ये पहुना! लाली को चुप करा लेना नहीं तो रोते रोते इनका सर दुखने लगेगा। हमारी लाड़ो का ध्यान रखना अब ये आपकी ही जिम्मेदारी हैं।
गाड़ी धीरे धीरे धूल उड़ाती हुई आंखों से ओझल होने लगती है और सभी लोग आंसू पोछते हुए थके कदमों से घर को लौटने लगते हैं।

 

दिनेश मिश्रा की कलम से नौतनवा महाराजगंज

Whatsapp बटन दबा कर इस न्यूज को शेयर जरूर करें 

Advertising Space


स्वतंत्र और सच्ची पत्रकारिता के लिए ज़रूरी है कि वो कॉरपोरेट और राजनैतिक नियंत्रण से मुक्त हो। ऐसा तभी संभव है जब जनता आगे आए और सहयोग करे.

Donate Now

लाइव कैलेंडर

March 2026
M T W T F S S
 1
2345678
9101112131415
16171819202122
23242526272829
3031  
[responsivevoice_button voice="Hindi Male"]